जापान यात्रा पर रवाना हुए PM मोदी, एटमी करार सहित कई समझौतों पर हस्ताक्षर की उम्मीद

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन दिवसीय यात्रा पर आज जापान रवाना हुए। इस दौरान दोनों देशों के बीच एक असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर होने के अलावा व्यापार, निवेश एवं सुरक्षा समेत विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होने की उम्मीद है। प्रधानमंत्री के तौर पर जापान की अपनी दूसरी यात्रा में मोदी अपने समकक्ष शिंजो अबे के साथ वाषिर्क शिखर सम्मेलन बैठक करेंगे और जापान के सम्राट के साथ तोक्यो में मुलाकात करेंगे।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने आज सुबह ट्विटर पर कहा, ‘पूर्व की ओर यात्रा शुरू, इस बार जापान के साथ वाषिर्क शिखर सम्मेलन होगा। प्रधानमंत्री तोक्यो रवाना हुए।’मोदी तोक्यो से अबे के साथ प्रसिद्ध शिंकनसेन बुलेट ट्रेन के जरिए कोबे जाएंगे। इस बुलेट ट्रेन की तकनीक का इस्तेमाल मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेलवे में किया जाएगा।

वह कोबे में कावासाकी हैवी इंडस्ट्रीज फेसिलिटी में जाएंगे जहां उच्च गति की रेलवे का निर्माण होता है। मोदी ने कल एक बयान में कहा था, ‘मैं व्यापार एवं निवेश संबंधों को और मजबूत करने के तरीके तलाश करने के लिए भारत एवं जापान के शीर्ष व्यापारिक नेताओं के साथ विस्तृत वार्ता करूंगा।’

मोदी ने कहा कि वह कल तोक्यो में अबे के साथ मुलाकात के दौरान द्विपक्षीय सहयोग के संपूर्ण पहलुओं की समीक्षा करेंगे। उन्होंने कहा, ‘जापान के साथ हमारी साझेदारी को विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझीदारी कहा जाता है। भारत एवं जापान साझी बौद्ध विरासत, लोकतांत्रिक मूल्यों और मुक्त, समावेशी एवं नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता के चश्मे से एक दूसरे को देखते हैं।’ दोनों देश यात्रा के दौरान असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। दोनों देशों ने पिछले साल दिसंबर में यहां अबे की यात्रा के दौरान एक वृहद समझौते पर मुहर लगाई थी लेकिन अंतिम समझौते पर अभी हस्ताक्षर होने हैं क्योंकि कुछ तकनीकी एवं कानूनी मामलों को सुलझाया जाना बाकी था।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने पिछले सप्ताह कहा था कि दोनों देशों ने समझौते के पाठ के कानूनी एवं तकनीकी पहलुओं समेत आंतरिक प्रक्रियाओं को पूरा कर लिया है। दोनों देशों के बीच परमाणु समझौते के लिए वार्ता कई वषरें से चल रही है लेकिन फुकुशिमा परमाणु उर्जा संयंत्र में 2011 की दुर्घटना के बाद जापान में राजनीतिक प्रतिरोध के कारण इस दिशा में काम आगे नहीं बढ़ पाया था।

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